मध्यकालीन भारत में कबीर व सूफी परंपरा: सामाजिक एवं सांस्कृतिक महत्व
DOI:- https://doi.org/10.64880/shikshasamvad.v3i4.69
Author : डा० शिवम वर्मा
संक्षेपिका (Abstract)
मध्यकालीन भारतीय इतिहास (12वीं से 16वीं शताब्दी) वैचारिक अंतर्विरोधों, संस्थागत धार्मिक जटिलताओं, राजनीतिक उथल-पुथल और सामाजिक स्तरीकरण का एक अत्यंत संवेदनशील कालखण्ड था। इस दौर में उभरे निर्गुण भक्ति आंदोलन (जिसके शीर्ष पुरुष कबीर थे) और सूफी आंदोलन ने भारतीय उपमहाद्वीप के केवल धार्मिक परिदृश्य को ही नहीं बदला, बल्कि समाज के संरचनात्मक ढांचे को भी पुनर्गठित किया। प्रस्तुत शोध पत्र कबीर की मारक साखियों और सूफी संतों के ‘वहदत-उल-वजूद’ (सर्वेश्वरवाद/अद्वैतवाद) के दार्शनिक सिद्धांतों का एक अंतर-विषयक (interdisciplinary) और ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह शोध इस बात की पड़ताल करता है कि किस प्रकार इन दोनों समानांतर धाराओं ने तत्कालीन सामंती व्यवस्था, कठोर जाति-प्रथा, पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियों और शासक वर्ग की धार्मिक कट्टरता को चुनौती दी। इसके साथ ही, लोक भाषाओं (vernacular languages) के लोकतांत्रिकरण, शास्त्रीय व लोक संगीत के समन्वय तथा समकालीन दिल्ली सल्तनत व मुगल साम्राज्य की राजनैतिक नीतियों पर पड़े इनके दूरगामी प्रभावों का मूल्यांकन करना इस शोध पत्र का मुख्य लक्ष्य है।
Cite this Article:
वर्मा, डा० शिवम . (2026). मध्यकालीन भारत में कबीर व सूफी परंपरा: सामाजिक एवं सांस्कृतिक महत्व. Shiksha Samvad International Open Access Peer-Reviewed & Refereed Journal of Multidisciplinary Research, 3(4) 644-650, ISSN: 2584-0983 (Online), Volume 03, Issue 04, June-2026. DOI:- https://doi.org/10.64880/shikshasamvad.v3i4.69
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