पंचकोश सिद्धांत का दार्शनिक आधार एवं वर्तमान परिप्रेक्ष्य में शैक्षिक उपयोगिता
Author: सुशील कुमार सिंह
शोध सार :
प्रस्तुत शोध पत्र तैत्तिरीयोपनिषद् की ब्रह्मानन्द वल्ली में प्रतिपादित ‘पंचकोश’ सिद्धांत के आलोक में मानव अस्तित्व की बहुस्तरीय चेतनात्मक संरचना का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस अध्ययन का उद्देश्य वर्तमान समय के आलोक में अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय तथा आनन्दमय कोशों के स्वरूप, कार्य-प्रणाली एवं उनके पारस्परिक संबंधों को स्पष्ट करना है, साथ ही साथ यह भी देखना है कि ये कोश व्यक्ति के समग्र विकास में किस प्रकार सहायक सिद्ध होते हैं। शोध पत्र में यह प्रतिपादित किया गया है कि अन्नमय कोश मानव के स्थूल शरीर का आधार है, जो अन्न से निर्मित एवं पोषित होता है। प्राणमय कोश जीवन ऊर्जा का केंद्र होकर शारीरिक क्रियाओं एवं श्वसन-प्रक्रिया का संचालन करता है। मनोमय कोश मानसिक गतिविधियों, भावनाओं एवं संकल्प-विकल्प का नियमन करता है, जबकि विज्ञानमय कोश बुद्धि, विवेक, ज्ञान एवं निर्णय क्षमता का संवाहक है। अंतः आनन्दमय कोश आत्मा के निकट स्थित होकर शुद्ध आनन्द एवं आध्यात्मिक शांति का अनुभव प्रतीत कराता है। निष्कर्षतः यह अध्ययन प्रस्तुत करता है कि इन पाँचों कोशों का संतुलन एवं समन्वय व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष के लिए अत्यंत ही आवश्यक है। योग, प्राणायाम, ध्यान तथा सात्त्विक आहार-विहार के माध्यम से इन कोशों का संतुलन बनाया जा सकता है, जिससे आन्तरिक शांति, संतोष एवं आनन्द की प्राप्ति संभव होती दिखती है। अंततः यह शोध पत्र इस बात की संतुति करता है कि पंचकोश सिद्धांत भारतीय ज्ञान परम्परा का एक महत्वपूर्ण दार्शनिक आधार है, जो आधुनिक जीवन में समग्र स्वास्थ्य, संतुलन एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए एक प्रभावी एवं व्यावहारिक मार्ग प्रदान करता है।
मुख्य बिंदु : तैत्तिरीयोपनिषद् , पंचकोश, भारतीय ज्ञान परंपरा, दार्शनिक आधार, आध्यात्मिक शिक्षा, योग शिक्षा, शारीरिक शिक्षा, आदि।
Cite this Article:
सुशील कुमार सिंह, “पंचकोश सिद्धांत का दार्शनिक आधार एवं वर्तमान परिप्रेक्ष्य में शैक्षिक उपयोगिता ” Shiksha Samvad International Open Access Peer-Reviewed & Refereed Journal of Multidisciplinary Research, ISSN: 2584-0983 (Online), Volume 03, Issue 04, Pp.350- 355, June-2026. Journal URL: https://shikshasamvad.com/
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