हिंदी उपन्यासों में तनाव, अवसाद और अस्तित्वगत संकट का अध्ययन
DOI:- https://doi.org/10.64880/shikshasamvad.v3i4.71
Author:प्रह्लाद राम
सार
हिंदी उपन्यासों में तनाव, अवसाद और अस्तित्वगत संकट का अध्ययन विषय समकालीन हिंदी साहित्य में मनुष्य के बदलते मानसिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अनुभवों की पड़ताल करता है। आधुनिक जीवन की प्रतिस्पर्धा, पारिवारिक विघटन, सामाजिक असमानता, आर्थिक असुरक्षा तथा बदलते नैतिक मूल्यों के कारण व्यक्ति तनाव, अवसाद और अस्तित्वगत संकट जैसी जटिल मानसिक स्थितियों से गुजरता है। हिंदी उपन्यासकारों ने इन मनोवैज्ञानिक एवं दार्शनिक आयामों को यथार्थपरक और संवेदनशील ढंग से अभिव्यक्त किया है। प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य चयनित हिंदी उपन्यासों के माध्यम से पात्रों के मानसिक संघर्ष, आत्मपहचान, अकेलेपन, जीवन-मूल्यों के विघटन तथा अर्थपूर्ण अस्तित्व की खोज का विश्लेषण करना है। यह अध्ययन मनोविश्लेषणात्मक, समाजशास्त्रीय तथा अस्तित्ववादी दृष्टिकोणों के आलोक में यह स्पष्ट करेगा कि हिंदी उपन्यास केवल सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि मानवीय मनःस्थिति और अस्तित्वगत द्वंद्व का सशक्त साहित्यिक आख्यान भी हैं।
प्रमुख शब्द— हिंदी उपन्यास, तनाव, अवसाद, अस्तित्वगत संकट, मनोविश्लेषण, अस्तित्ववाद, मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक यथार्थ, आत्मपहचान, आधुनिक जीवन।
Cite this Article:
राम, प्रह्लाद. (2026). हिंदी उपन्यासों में तनाव, अवसाद और अस्तित्वगत संकट का अध्ययन. Shiksha Samvad International Open Access Peer-Reviewed & Refereed Journal of Multidisciplinary Research, 3(4) 669-678, ISSN: 2584-0983 (Online), Volume 03, Issue 04, June-2026.
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