भिक्षावृत्ति एक अभिशाप: भारतीय समाज के सन्दर्भ में
Author : डॉ.श्याम नारायण वर्मा
सारांश-
यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण न होगा की अगर भीख मांगना नही आता तो तम्बाकू खाना सीख लेना चाहिए अर्थात ‘मांग न आवै भीख तो सुरती खाना सीख‘ इस प्रचलित लोकोक्ति से भिक्षा मागने की आदत खुद-ब-खुद पड़ ही जायेगी। भारत में भिक्षावृत्ति अगर एक तरफ विपन्नता के कारण बढ़ी है तो दूसरी तरफ इसे एक आसान कार्य एवं व्यवसाय के रूप में महसूस किया गया है जो भी हो ऐसी प्रवृत्ति किसी भी सभ्य समाज के लिए बदनुमा दाग से कम नहीं है। भारत की एक बड़ी आबादी इस पेशे में संलिप्त है इस क्षेत्र से नौनिहाल भी अब अलग नहीं रहे लगातार बढ़ती भिक्षावृत्ति एक सभ्य समाज के माथे पर कलंक के समान है इसे दूर किये बिना हम विकसित भारत, विश्व गुरु बनने जैसे सपने को साकार करने की कोरी कल्पना से ग्रस्त कहे जायेगें ।
Cite this Article:
डॉ.श्याम नारायण वर्मा, “भिक्षावृत्ति एक अभिशाप: भारतीय समाज के सन्दर्भ में”Shiksha Samvad International Open Access Peer-Reviewed & Refereed Journal of Multidisciplinary Research, ISSN: 2584-0983 (Online), Volume 03, Issue 03, pp.241-244, March-2026. Journal URL: https://shikshasamvad.com/
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