भारतीय अर्थव्यवस्था पर जनसंख्या वृद्धि का प्रभाव: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
Author : डॉ रमेश कुमार
सारांश
जनसंख्या किसी भी अर्थव्यवस्था के विकास की आधारभूत शक्ति भी हो सकती है और संसाधनों पर दबाव उत्पन्न करने वाला कारक भी। इसका वास्तविक प्रभाव जनसंख्या के आकार से अधिक उसकी आयु-संरचना, स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल, रोजगार तथा उत्पादकता पर निर्भर करता है। भारत स्वतंत्रता के बाद तीव्र जनसंख्या वृद्धि से गुजरा है। वर्ष 1951 में देश की जनसंख्या लगभग 36.11 करोड़ थी, जो 2011 की जनगणना तक लगभग 121 करोड़ हो गई। संयुक्त राष्ट्र के वर्ष 2025 के अनुमान के अनुसार भारत की जनसंख्या लगभग 146.39 करोड़ है। यद्यपि जनसंख्या का कुल आकार लगातार बढ़ा है, किंतु जनसंख्या वृद्धि की दर तथा प्रजनन दर में उल्लेखनीय गिरावट आई है। NFHS-5 के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर 2.0 बच्चे प्रति महिला तक आ चुकी है। बड़ी जनसंख्या भारत को विशाल श्रम-शक्ति, उपभोक्ता बाजार, उद्यमिता, बचत, निवेश और उत्पादन की संभावनाएँ प्रदान करती है। दूसरी ओर पर्याप्त रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में यही जनसंख्या बेरोजगारी, प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव, शहरी भीड़, आय असमानता तथा सामाजिक व्यय में वृद्धि का कारण बन सकती है। प्रस्तुत शोध-पत्र द्वितीयक आँकड़ों पर आधारित है तथा इसका उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था पर जनसंख्या वृद्धि के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों का संतुलित विश्लेषण करना है। अध्ययन का मुख्य निष्कर्ष यह है कि भारत की वास्तविक चुनौती केवल जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करना नहीं है, बल्कि उपलब्ध मानव संसाधन को स्वस्थ, शिक्षित, कुशल और उत्पादक मानव पूँजी में परिवर्तित करना है।
मुख्य शब्द: जनसंख्या वृद्धि, भारतीय अर्थव्यवस्था, जनसांख्यिकीय लाभांश, बेरोजगारी, मानव पूँजी, शहरीकरण, प्रजनन दर, आर्थिक विकास।
Cite this Article:
कुमार, डॉ रमेश. (2026). भारतीय अर्थव्यवस्था पर जनसंख्या वृद्धि का प्रभाव: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन. Shiksha Samvad International Open Access Peer-Reviewed & Refereed Journal of Multidisciplinary Research, ISSN: 2584-0983 (Online), Volume 03, Issue 03, Pp.382-393, March-2026. Journal
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