भीष्म साहनी की कहानियों में साम्प्रदायिकता और मानव मूल्य
Author : डॉ० कृष्ण कुमार पाल
सारांश :
यह शोधपत्र भीष्म साहनी की कहानियों में निहित “साम्प्रदायिकता और मानव मूल्यों” का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। भीष्म साहनी ने अपनी कहानियों के माध्यम से भारत-विभाजन के समय उत्पन्न सामाजिक, राजनीतिक और मानसिक संकटों को अत्यंत यथार्थ और संवेदनात्मक रूप में चित्रित किया है। इस शोधपत्र में उसी ‘साम्प्रदायिकता’ जोकि एक संकीर्ण मानसिकता है, जिसमें व्यक्ति अपने धर्म को श्रेष्ठ मानकर अन्य धर्मों के प्रति द्वेष रखता है। यह प्रवृत्ति ऐतिहासिक, राजनीतिक और सामाजिक कारणों से विकसित होती है और अंततः हिंसा तथा अमानवीयता को जन्म देती है। भीष्म साहनी की प्रमुख कहानियाँ—‘अमृतसर आ गया’, ‘पाली’, ‘निमित्त’ और ‘झुटपुट’ के विश्लेषण से यह स्पष्ट किया गया है कि साम्प्रदायिक परिस्थितियाँ मनुष्य को क्रूर बना सकती हैं लेकिन उसके भीतर मानवीय संवेदनाएँ पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं हैं। ‘पाली’ में जहाँ एक मुस्लिम परिवार द्वारा हिन्दू बालक का पालन-पोषण मानवता की मिसाल प्रस्तुत करता है, वहीं ‘अमृतसर आ गया’ में परिस्थितियों के अनुसार बदलती मानवीय प्रवृत्ति को दर्शाया गया है। अंततः इस शोधपत्र में यह स्थापित किया गया है कि भीष्म साहनी की कहानियाँ साम्प्रदायिकता की विडंबनाओं को उजागर करते हुए मानवता, करुणा, सहिष्णुता और भाईचारे जैसे मूल्यों को स्थापित करती हैं। उनकी रचनाएँ आज भी समाज को साम्प्रदायिकता से ऊपर उठकर मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देती हैं।
बीज शब्द: साम्प्रदायिकता की मनोवृत्ति, उदारता का पाखंड, विभाजन की त्रासदी, दंगे, विस्थापन
Cite this Article:
डॉ० कृष्ण कुमार पाल,,“ भीष्म साहनी की कहानियों में साम्प्रदायिकता और मानव मूल्य”Shiksha Samvad International Open Access Peer-Reviewed & Refereed Journal of Multidisciplinary Research, ISSN: 2584-0983 (Online), Volume 03, Issue 03, pp.208-2012, March-2026. Journal URL: https://shikshasamvad.com/
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