बालकों के व्यक्तित्व विकास में शिक्षा की भूमिका: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

Authors

  • डॉ. सीमा असिस्टेंट प्रोफेसर, शारदा कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन एंड टेक्नोलॉजी Author

DOI:

https://doi.org/10.64880/shikshasamvad.v4i1.02

Keywords:

बालक, व्यक्तित्व विकास, शिक्षा, विद्यालय, शिक्षक, नैतिक विकास, सामाजिक विकास, जीवन-कौशल, सह-पाठ्यक्रम गतिविधियाँ, समग्र विकास।

Abstract

व्यक्तित्व विकास मानव जीवन की एक सतत, गतिशील और बहुआयामी प्रक्रिया है, जो जन्म से प्रारंभ होकर जीवन के विभिन्न चरणों में निरंतर विकसित होती रहती है। बाल्यावस्था व्यक्तित्व निर्माण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इसी अवस्था में बालक की आदतें, रुचियाँ, दृष्टिकोण, मूल्य, आत्मविश्वास, सामाजिक व्यवहार और भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ आकार ग्रहण करने लगती हैं। बालक के व्यक्तित्व पर परिवार, समाज, संस्कृति, आर्थिक परिस्थितियों और परिवेश का प्रभाव पड़ता है, किंतु इन सभी के बीच शिक्षा की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। शिक्षा बालक को केवल विषयगत ज्ञान प्रदान नहीं करती, बल्कि उसके बौद्धिक, शारीरिक, सामाजिक, भावनात्मक, नैतिक एवं सृजनात्मक विकास के लिए अनुकूल अवसर भी उपलब्ध कराती है।

विद्यालय बालक के लिए परिवार के बाद सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था है। विद्यालय में शिक्षक का व्यवहार, सहपाठियों के साथ संपर्क, अनुशासन, शिक्षण पद्धति, खेलकूद, सांस्कृतिक गतिविधियाँ तथा लोकतांत्रिक वातावरण उसके व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं। एक संवेदनशील एवं प्रशिक्षित शिक्षक बालक में आत्मविश्वास, स्वतंत्र चिंतन, सृजनात्मकता, अनुशासन, सहानुभूति, नेतृत्व तथा जिम्मेदारी जैसे गुणों को विकसित कर सकता है। इसी प्रकार सह-पाठ्यक्रम गतिविधियाँ बालकों की छिपी हुई प्रतिभाओं को पहचानने और उन्हें अभिव्यक्ति प्रदान करने में सहायक होती हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी शिक्षा को केवल संज्ञानात्मक ज्ञान तक सीमित न रखकर विद्यार्थियों के समग्र विकास, आलोचनात्मक चिंतन, सृजनात्मकता, जीवन-कौशल, नैतिकता एवं संवैधानिक मूल्यों के विकास से जोड़ने पर बल दिया गया है। प्रस्तुत शोध-पत्र में बाल व्यक्तित्व की अवधारणा, व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों, शिक्षा, शिक्षक, विद्यालय, परिवार एवं सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों की भूमिका का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन से यह निष्कर्ष सामने आता है कि यदि शिक्षा को परीक्षा एवं अंक-केंद्रित व्यवस्था से आगे बढ़ाकर बाल-केंद्रित, अनुभवात्मक एवं मूल्यपरक बनाया जाए तो यह संतुलित, आत्मविश्वासी, संवेदनशील और उत्तरदायी व्यक्तित्व के निर्माण में प्रभावी भूमिका निभा सकती है।

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Published

2026-09-03

How to Cite

बालकों के व्यक्तित्व विकास में शिक्षा की भूमिका: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन. (2026). Shiksha Samvad, 4(1), 16-24. https://doi.org/10.64880/shikshasamvad.v4i1.02