स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व: डॉ. भीमराव अंबेडकर के राष्ट्रवाद की दार्शनिक आधारभूमि
DOI:
https://doi.org/10.64880/shikshasamvad.v4i1.22Keywords:
डॉ. बी. आर. अंबेडकर, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, राष्ट्रवाद, सामाजिक लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, संवैधानिक लोकतंत्र।Abstract
डॉ. भीमराव अंबेडकर का राष्ट्रवादी चिंतन भारतीय समाज की ऐतिहासिक असमानताओं, जाति-आधारित विभाजन, लोकतांत्रिक नागरिकता और सामाजिक न्याय के प्रश्नों से गहराई से जुड़ा है। उनके लिए राष्ट्र केवल भू-राजनीतिक इकाई अथवा साझा राजनीतिक सत्ता नहीं था; लोकतांत्रिक राष्ट्र के निर्माण के लिए नागरिकों के बीच स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित सामाजिक संबंध आवश्यक थे। प्रस्तुत शोध-लेख अंबेडकर के राष्ट्रवाद की दार्शनिक आधारभूमि के रूप में इन तीन सिद्धांतों का विश्लेषण करता है। अध्ययन ऐतिहासिक, दार्शनिक और विश्लेषणात्मक पद्धति पर आधारित है तथा अंबेडकर के मूल लेखन, विशेषतः Annihilation of Caste, The Buddha and His Dhamma, States and Minorities और संविधान सभा में उनके भाषणों को प्राथमिक स्रोत मानता है। 25 नवम्बर 1949 के संविधान सभा भाषण में अंबेडकर ने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को अलग-अलग सिद्धांत न मानकर एक अविभाज्य त्रयी के रूप में प्रस्तुत किया। उनके अनुसार समानता से पृथक स्वतंत्रता कुछ लोगों के प्रभुत्व को जन्म दे सकती है, स्वतंत्रता से पृथक समानता व्यक्तिगत पहल को बाधित कर सकती है, और बंधुत्व के बिना दोनों को सामाजिक जीवन में स्वाभाविक आधार नहीं मिल सकता। अध्ययन यह प्रतिपादित करता है कि अंबेडकर के राष्ट्रवाद की लोकतांत्रिक शक्ति इसी त्रयी में निहित है: स्वतंत्रता व्यक्ति की स्वायत्तता को, समानता समान नागरिक गरिमा को और बंधुत्व साझा राष्ट्रीय जीवन को आधार प्रदान करता है।