बाल अपराध की उभरती प्रवृत्तियों की पहचान और उसके निवारण : एक समाजशास्त्रीय अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.64880/shikshasamvad.v4i1.27Keywords:
बाल अपराध, किशोर अपराध, सामाजिकरण, परिवार, सहकर्मी समूह, विद्यालय, डिजिटल वातावरण, सामाजिक नियंत्रण, पुनर्वास, किशोर न्याय।Abstract
बाल अपराध आधुनिक समाज की एक जटिल सामाजिक समस्या है, जिसका संबंध केवल बालक के व्यक्तिगत व्यवहार से नहीं बल्कि परिवार, विद्यालय, सहकर्मी समूह, आर्थिक परिस्थितियों, सामाजिक संरचना, नगरीकरण, प्रवासन, मीडिया तथा डिजिटल वातावरण जैसे अनेक सामाजिक कारकों से है। बाल्यावस्था और किशोरावस्था सामाजिकरण की महत्वपूर्ण अवस्थाएँ हैं। इस अवधि में बालक अपने व्यवहार, मूल्यों और सामाजिक भूमिकाओं का निर्माण परिवार तथा व्यापक सामाजिक वातावरण से करता है। जब सामाजिक नियंत्रण, पारिवारिक संरक्षण, शैक्षिक अवसर और सकारात्मक सामाजिक संबंध कमजोर होते हैं, तब विचलित व्यवहार की संभावना बढ़ सकती है। वर्तमान समय में बाल अपराध की प्रकृति भी बदल रही है। पारंपरिक चोरी, मारपीट और संपत्ति संबंधी अपराधों के साथ-साथ समूह-आधारित अपराध, मादक पदार्थों से संबंधित गतिविधियाँ, डिजिटल माध्यमों से जुड़े विचलित व्यवहार तथा सामाजिक-मीडिया से प्रभावित व्यवहार भी चिंता का विषय बने हैं।
इस शोध-पत्र का उद्देश्य बाल अपराध की उभरती प्रवृत्तियों की पहचान करना, उनके समाजशास्त्रीय कारणों का विश्लेषण करना तथा उनके निवारण के लिए परिवार, विद्यालय, समुदाय, राज्य और न्याय व्यवस्था की भूमिका को स्पष्ट करना है। अध्ययन मुख्यतः द्वितीयक स्रोतों पर आधारित वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन है। इसमें पूर्व प्रकाशित शोध, समाजशास्त्रीय साहित्य, विधिक प्रावधान तथा बाल न्याय व्यवस्था से संबंधित आधिकारिक सामग्री का विश्लेषण किया गया है। साहित्य से स्पष्ट होता है कि बाल अपराध को केवल दंड की समस्या के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है; इसके लिए सामाजिकरण, सामाजिक नियंत्रण, पुनर्वास और सामाजिक पुनःएकीकरण को केंद्र में रखना आवश्यक है। भारतीय किशोर न्याय व्यवस्था भी पुनर्वास तथा सामाजिक पुनःएकीकरण पर बल देती है।