रामचरितमानस के पात्रों का चरित्र-चित्रण: मनोवैज्ञानिक, नैतिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य
DOI:
https://doi.org/10.64880/shikshasamvad.v4i1.04Keywords:
गोस्वामी तुलसीदास, रामचरितमानस, धार्मिक आस्था, भक्ति, दर्शन, नीति, लोकजीवन मानवीय संवेदनाओं ।Abstract
गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस हिंदी साहित्य की ऐसी कालजयी कृति है जिसमें धार्मिक आस्था, भक्ति, दर्शन, नीति, लोकजीवन तथा मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। तुलसीदास ने रामकथा को केवल धार्मिक आख्यान के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उसके पात्रों को विविध मानवीय भावनाओं, नैतिक द्वंद्वों और सांस्कृतिक मूल्यों के वाहक के रूप में विकसित किया है। रामचरितमानस के राम, सीता, लक्ष्मण, भरत, हनुमान, दशरथ, कैकेयी, रावण, विभीषण, शबरी तथा निषादराज आदि पात्र अपने-अपने स्तर पर मनुष्य के व्यक्तित्व और सामाजिक जीवन की विभिन्न प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। तुलसीदास की पात्र-सृष्टि का वैशिष्ट्य यह है कि आदर्श पात्रों के भीतर भी मानवीय संवेदना दिखाई देती है और नकारात्मक पात्रों के भीतर भी ज्ञान, क्षमता तथा अंतर्द्वंद्व के संकेत मिलते हैं।
प्रस्तुत शोध-पत्र में रामचरितमानस के प्रमुख पात्रों के चरित्र-चित्रण का तीन प्रमुख दृष्टियों-मनोवैज्ञानिक, नैतिक और सांस्कृतिक-से विश्लेषण किया गया है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से राम का कर्तव्यबोध, सीता की दृढ़ता, लक्ष्मण की संवेदनशीलता, भरत का त्याग, दशरथ का वात्सल्य, कैकेयी का मानसिक परिवर्तन और रावण का अहंकार महत्वपूर्ण हैं। नैतिक दृष्टि से सत्य, धर्म, त्याग, मर्यादा, सेवा, करुणा, भक्ति और न्याय जैसे मूल्यों का चरित्रों के माध्यम से निरूपण हुआ है। सांस्कृतिक दृष्टि से ये पात्र भारतीय परिवार-व्यवस्था, राजधर्म, लोकमंगल, भक्ति-संस्कृति, गुरु-शिष्य संबंध, स्त्री-पुरुष संबंध तथा सामाजिक समरसता की अवधारणाओं को अभिव्यक्त करते हैं। इस प्रकार रामचरितमानस की पात्र-सृष्टि केवल अतीत का साहित्यिक आख्यान नहीं है, बल्कि मानव-व्यवहार और मूल्य-चेतना को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है।