राही मासूम रज़ा के उपन्यास ‘आधा गाँव’ में विभाजन की त्रासदी एवं सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का विश्लेषण
DOI:
https://doi.org/10.64880/shikshasamvad.v4i1.37Keywords:
राही मासूम रज़ा, आधा गाँव, देश-विभाजन, सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक चेतना, सांप्रदायिक सद्भाव, ग्रामीण जीवन, मानवीय संवेदना।Abstract
राही मासूम रज़ा हिंदी साहित्य के उन महत्त्वपूर्ण साहित्यकारों में हैं, जिन्होंने भारतीय समाज की जटिलताओं, सांप्रदायिक संबंधों, मानवीय संवेदनाओं तथा सामाजिक परिवर्तन को अपनी रचनाओं में प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है। उनका उपन्यास आधा गाँव भारतीय स्वतंत्रता और 1947 के देश-विभाजन की पृष्ठभूमि में ग्रामीण समाज के जीवन, सांस्कृतिक परंपराओं तथा सामुदायिक संबंधों में आए बदलावों को प्रस्तुत करता है। उपन्यास में गंगौली गाँव के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया है कि राजनीतिक निर्णयों का प्रभाव सामान्य मनुष्य के जीवन, उसकी पहचान और सामाजिक संबंधों पर किस प्रकार पड़ता है।
प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य आधा गाँव में विभाजन की त्रासदी, सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना, सांप्रदायिक सद्भाव तथा मानवीय मूल्यों का विश्लेषण करना है। इसमें यह भी विवेचित किया गया है कि धार्मिक पहचान के आधार पर समाज को विभाजित करने वाली प्रवृत्तियाँ स्थानीय संस्कृति और पारस्परिक संबंधों को किस प्रकार प्रभावित करती हैं। उपन्यास में ग्रामीण जीवन का चित्रण केवल ऐतिहासिक घटना का विवरण नहीं है, बल्कि वह भारतीय समाज की बहुलतावादी संस्कृति और मानवीय संबंधों की जटिलताओं को समझने का माध्यम भी है।