समकालीन सामाजिक एवं वैश्विक परिप्रेक्ष्य में ‘रश्मिरथी’ और ‘कुरुक्षेत्र’ की प्रासंगिकता: एक आलोचनात्मक अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.64880/shikshasamvad.v4i1.40Keywords:
रामधारी सिंह दिनकर, रश्मिरथी, कुरुक्षेत्र, समकालीन प्रासंगिकता, सामाजिक न्याय, युद्ध और शांति, मानवतावाद, नैतिक चेतना।Abstract
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ आधुनिक हिं दी साहित्य के प्रमुख कवियों में से एक हैं। उनकी काव्य- रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक न्याय, मानवीय संवेदना, नैतिकता, संघर्ष तथा मानवतावादी दृष्टिकोण का सशक्त चित्रण मिलता है। ‘रश्मिरथी’ और ‘कुरुक्षेत्र’ उनकी ऐसी महत्त्वपूर्ण काव्यकृतियाँ हैं, जो भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के आधार पर आधुनिक जीवन की जटिल समस्याओं पर विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं। ‘रश्मिरथी’ में महाभारत के कर्ण के चरित्र के माध्यम से सामाजिक विषमता, जातिगत भेदभाव, आत्मसम्मान, मित्रता, दानशीलता तथा कर्तव्यबोध जैसे प्रश्नों को अभिव्यक्ति मिली है। दूसरी ओर, ‘कुरुक्षेत्र’ में युद्ध, शांति, हिंसा, अहिंसा, नैतिक दायित्व और मानवता के भविष्य से संबंधित प्रश्नों का गंभीर विवेचन किया गया है। वर्तमान समय में विश्व विभिन्न प्रकार के संघर्षों, युद्धों, सामाजिक असमानताओं, सांस्कृतिक तनावों तथा नैतिक संकटों का सामना कर रहा है। ऐसी परिस्थितियों में दिनकर की ये दोनों काव्यकृतियाँ विशेष प्रासंगिकता रखती हैं। ‘रश्मिरथी’ सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा की आवश्यकता को रेखांकित करती है, जबकि ‘कुरुक्षेत्र’ युद्ध की विनाशकारी परिणतियों तथा शांति की स्थापना के लिए आवश्यक नैतिक दृष्टि पर विचार करने का अवसर प्रदान करती है। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य दोनों काव्यकृतियों का आलोचनात्मक एवं तुलनात्मक अध्ययन करते हुए समकालीन सामाजिक और वैश्विक परिस्थितियों में उनकी प्रासंगिकता का विश्लेषण करना है। अध्ययन में पाठ-विश्लेषण एवं तुलनात्मक साहित्यिक पद्धति का उपयोग किया गया है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि दिनकर का काव्य केवल अपने समय का साहित्यिक दस्तावेज नहीं, बल्कि वर्तमान समाज को न्याय, विवेक, उत्तरदायित्व और मानवता की दिशा में प्रेरित करने वाला महत्त्वपूर्ण वैचारिक आधार भी है।