भारतीय निर्वाचन प्रणाली में सुधार की आवश्यकता: पारदर्शिता, जवाबदेही एवं लोकतांत्रिक सुदृढ़ीकरण का अध्ययन

Authors

  • हर्षा जैन शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, भारती विश्वविद्यालय, दुर्ग (छत्तीसगढ़) Author
  • डॉ. सरोज कुमार पर्यवेक्षक, राजनीति विज्ञान विभाग, भारती विश्वविद्यालय, दुर्ग (छत्तीसगढ़) Author

DOI:

https://doi.org/10.64880/shikshasamvad.v4i1.41

Keywords:

चुनाव सुधार; भारतीय लोकतंत्र; निर्वाचन आयोग; राजनीति का अपराधीकरण; चुनावी वित्त; एक राष्ट्र एक चुनाव; मेटा-विश्लेषण

Abstract

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहाँ चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता, पारदर्शिता और समावेशिता लोकतांत्रिक वैधता की बुनियादी शर्त है। स्वतंत्रता के बाद से निर्वाचन प्रबंधन, इलेक्ट्रॉनिक मतदान और मतदाता पंजीकरण में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। फिर भी राजनीति का अपराधीकरण, चुनावी खर्च और राजनीतिक चंदे की अपारदर्शिता, निर्वाचन संस्थाओं की स्वायत्तता, मतदाता सूचियों की शुद्धता, महिलाओं का सीमित प्रतिनिधित्व और बार-बार होने वाले चुनावों से उत्पन्न शासन-संबंधी दबाव जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। यह समीक्षा-शोधपत्र चुनाव सुधारों पर उपलब्ध पूर्ववर्ती कार्यों का मेटा-विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। इसमें गोस्वामी समिति से लेकर विधि आयोग के प्रतिवेदनों, उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों, कोविंद समिति की रिपोर्ट और राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र के अनुभवजन्य शोधों तक के स्रोतों का व्यवस्थित संकलन, वर्गीकरण और विषयगत संश्लेषण किया गया है। पद्धति के रूप में PRISMA-प्रेरित समीक्षा-प्रारूप और विषयगत मेटा-संश्लेषण अपनाया गया है, क्योंकि स्रोतों की विषम प्रकृति के कारण परिमाणात्मक पूलिंग संभव नहीं थी। निष्कर्ष बताते हैं कि पिछले तीन दशकों में सुधार मुख्यतः न्यायिक हस्तक्षेप और नागरिक समाज की पहल से आगे बढ़े हैं, जबकि विधायी सुधार धीमे और खंडित रहे हैं। उम्मीदवारों के शपथ-पत्र के माध्यम से सूचना का अधिकार, नोटा, दोषसिद्ध जनप्रतिनिधियों की तत्काल अयोग्यता और चुनावी बॉन्ड योजना का निरस्त होना न्यायपालिका-प्रेरित उपलब्धियाँ हैं। आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों का चयन, दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र का अभाव और चुनावी वित्त की कमजोर निगरानी अब भी अनसुलझी हैं। 'एक राष्ट्र, एक चुनाव', विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति जैसे समसामयिक विषय सुधार-विमर्श के केंद्र में हैं। इन पर साक्ष्य-आधारित और संघीय संतुलन को ध्यान में रखने वाला दृष्टिकोण आवश्यक है। शोधपत्र का निष्कर्ष है कि भविष्य के सुधार पैकेज-आधारित होने चाहिए, जिनमें संस्थागत स्वतंत्रता, वित्तीय पारदर्शिता, दल-सुधार, तकनीकी सुरक्षा-उपाय और समावेशन एक साथ संबोधित हों। सुधारों के प्रभाव का स्वतंत्र मूल्यांकन और चुनावी डेटा की पारदर्शिता भी संस्थागत होनी चाहिए।

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Published

2026-09-30

How to Cite

भारतीय निर्वाचन प्रणाली में सुधार की आवश्यकता: पारदर्शिता, जवाबदेही एवं लोकतांत्रिक सुदृढ़ीकरण का अध्ययन. (2026). Shiksha Samvad, 4(1), 350-358. https://doi.org/10.64880/shikshasamvad.v4i1.41