मजदूर एवं कृषक वर्ग की समस्याएँ: नागार्जुन और रेणु का साहित्यिक परिप्रेक्ष्य
DOI:
https://doi.org/10.64880/shikshasamvad.v4i1.08Keywords:
नागार्जुन, फणीश्वरनाथ ‘रेणु’, मजदूर वर्ग, कृषक वर्ग, ग्रामीण जीवन, शोषण, आर्थिक विषमता, वर्गीय चेतना, सामाजिक यथार्थ, प्रतिरोध।Abstract
यह शोध नागार्जुन और फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ के साहित्य में मजदूर एवं कृषक वर्ग के जीवन, संघर्ष और समस्याओं के यथार्थपरक चित्रण का अध्ययन प्रस्तुत करता है। दोनों रचनाकारों ने ग्रामीण समाज, आर्थिक विषमता, शोषण, गरीबी, बेरोजगारी, सामंती व्यवस्था तथा श्रमजीवी वर्ग की सामाजिक विवशताओं को संवेदनशीलता और यथार्थबोध के साथ अभिव्यक्त किया है। नागार्जुन के साहित्य में किसान-मजदूरों के संघर्ष, वर्गीय चेतना और शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध का स्वर विशेष रूप से उभरता है, जबकि रेणु के साहित्य में ग्रामीण जीवन की जटिलताओं, लोक-संस्कृति और आमजन की रोजमर्रा की पीड़ा का मार्मिक चित्रण मिलता है। यह अध्ययन दोनों रचनाकारों की दृष्टि में समानताओं एवं भिन्नताओं को रेखांकित करते हुए यह स्पष्ट करने का प्रयास करेगा कि उनका साहित्य सामाजिक परिवर्तन, मानवीय गरिमा और आर्थिक न्याय की आकांक्षा को किस प्रकार अभिव्यक्त करता है।