अवधी-साहित्य में राम का स्वरूप विस्तार
DOI:- https://doi.org/10.64880/shikshasamvad.v3i4.63
Author(s) : डा0 प्रद्युम्न सिंह
शोध सारांश
प्रस्तुत शोध पत्र में हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर ’अवधी साहित्य’ के आलोक में भगवान श्रीराम के बहुआयामी एवं लोक-मंगलकारी स्वरूप का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है। भारतीय संस्कृति, इतिहास और दर्शन में ’अवध’ और ’अवधी’ भाषा का स्थान सर्वोपरि रहा है, जिसने भक्ति काल की विचार-चेतना को एक नई दिशा प्रदान की। इस शोध में गोस्वामी तुलसीदास विरचित ’रामचरितमानस’ एवं अन्य कृतियों के आधार पर राम के ब्रह्म (निर्गुण व सगुण एकात्मता), शील, शक्ति और सौंदर्य से युक्त स्वरूप को रेखांकित किया गया है। इसके अतिरिक्त, शोध पत्र में रामराज्य की आदर्श सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक व्यवस्था की प्रासंगिकता को स्पष्ट किया गया है, जहाँ विषमता, दरिद्रता और दैहिक-दैविक-भौतिक तापों का सर्वथा अभाव है। तुलसी के राम केवल एक दार्शनिक सत्ता नहीं हैं, बल्कि वे मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में आदर्श राजा, पुत्र, भ्राता और पति के व्यावहारिक प्रतिमान स्थापित करते हैं। साथ ही, समाज के वंचित, शोषित और निषाद-केवट जैसे लोक-चरित्रों के प्रति उनका आत्मीय व समतावादी दृष्टिकोण उन्हें एक महान लोक-नायक के रूप में प्रतिष्ठित करता है। निष्कर्षतः, यह शोध प्रदर्शित करता है कि अवधी काव्य में वर्णित राम का स्वरूप कालजयी है, जो युगीन विसंगतियों को दूर कर समरस समाज के निर्माण का शाश्वत संदेश देता है।
बीज शब्द-हिन्दी साहित्य, अवधी साहित्य, मर्यादा पुरुषोत्तम राम, गोस्वामी तुलसीदास, रामचरितमानस, लोक-मंगल और समरसता, रामराज्य की अवधारणा, सगुण-निर्गुण अभेद।
Cite this Article:
सिंह, डा0 प्रद्युम्न. (2026). अवधी-साहित्य में राम का स्वरूप विस्तार. Shiksha Samvad International Open Access Peer-Reviewed & Refereed Journal of Multidisciplinary Research, 3(4) 579- 584, ISSN: 2584-0983 (Online), Volume 03, Issue 04, June-2026.
License
Copyright (c) 2025 shiksha samvad
This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial 4.0 International License.