वैश्वीकरण के युग में भारतीय राष्ट्रवादः चुनौतियाँ और संभावनाएँ
Vol. 03, Issue 04, Pp. 449–457 | Published: 20 June 2026
DOI:- https://doi.org/10.64880/shikshasamvad.v3i4.47
Author(s): यादव रत्नेश कुमार केदारनाथ, डॉ. मनोज सिंह यादव
सारांश
इक्कीसवीं शताब्दी का विश्व वैश्वीकरण, तकनीकी क्रांति, मुक्त बाजार व्यवस्था तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग की नई संरचनाओं के दौर से गुजर रहा है। वैश्वीकरण ने विश्व के देशों के मध्य आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और तकनीकी संबंधों को अभूतपूर्व रूप से सुदृढ़ किया है। इसके परिणामस्वरूप पूँजी, वस्तुओं, सेवाओं, सूचना तथा मानव संसाधनों का वैश्विक स्तर पर तीव्र प्रवाह संभव हुआ है। भारत ने 1991 के आर्थिक सुधारों के पश्चात उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों को अपनाकर विश्व अर्थव्यवस्था में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराई। इससे आर्थिक विकास, विदेशी निवेश, सूचना प्रौद्योगिकी, डिजिटल अर्थव्यवस्था तथा सेवा क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। दूसरी ओर वैश्वीकरण ने भारतीय राष्ट्रवाद के समक्ष अनेक नई चुनौतियाँ भी प्रस्तुत की हैं। सांस्कृतिक समरूपीकरण, उपभोक्तावाद, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बढ़ता प्रभाव, आर्थिक असमानता, स्थानीय उद्योगों पर संकट, डिजिटल संप्रभुता तथा राष्ट्रीय पहचान जैसे प्रश्न आज अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए हैं। इन परिस्थितियों में भारतीय राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक अवधारणा न रहकर सांस्कृतिक आत्मविश्वास, आर्थिक आत्मनिर्भरता तथा वैश्विक उत्तरदायित्व का भी प्रतीक बन गया है। भारतीय राष्ट्रवाद की विशेषता यह है कि वह संकीर्ण राष्ट्रवाद के स्थान पर समावेशी, लोकतांत्रिक और मानवतावादी दृष्टिकोण का समर्थन करता है। ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम‘‘, ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः‘‘ तथा ‘‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य‘‘ जैसी अवधारणाएँ भारत की उसी सभ्यतागत दृष्टि को व्यक्त करती हैं जिसमें राष्ट्रीय हित और वैश्विक कल्याण परस्पर विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। यह शोध-पत्र वैश्वीकरण और भारतीय राष्ट्रवाद के अंतर्संबंधों का विश्लेषण करते हुए वर्तमान चुनौतियों तथा भविष्य की संभावनाओं का ऐतिहासिक एवं समकालीन दृष्टिकोण से अध्ययन प्रस्तुत करता है।
मुख्य शब्दः वैश्वीकरण, भारतीय राष्ट्रवाद, आर्थिक राष्ट्रवाद, स्वदेशी, वैश्विक शासन, आत्मनिर्भर भारत, वसुधैव कुटुम्बकम, विकसित भारत, सांस्कृतिक अस्मिता, वैश्विक राष्ट्रवाद।
Cite this Article:
यादव रत्नेश कुमार केदारनाथ, डॉ. मनोज सिंह यादव, “वैश्वीकरण के युग में भारतीय राष्ट्रवादः चुनौतियाँ और संभावनाएँ” Shiksha Samvad International Open Access Peer-Reviewed & Refereed Journal of Multidisciplinary Research, ISSN: 2584-0983 (Online), Volume 03, Issue 04, Pp.449- 457, June-2026. Journal URL: https://shikshasamvad.com/
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