मध्यकालीन हाड़ौती में सामाजिक परम्पराएं : गुगोर के शिलालेखों के विशेष संदर्भ में
DOI:- https://doi.org/10.64880/shikshasamvad.v3i4.52
Author(s):1निवेदिता भार्गव, 2डॉ. विधि शर्मा
शोधसार :
प्रस्तुत शोधपत्र मध्यकालीन हाड़ौती अंचल, विशेषकर गुगोर (छबड़ा) के समाज और सांस्कृतिक परम्पराओं का पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर विश्लेषणात्मक अध्ययन है| पारम्परिक इतिहास लेखन प्राय: राजनीतिक घटनाक्रमों और युद्धों तक सीमित रहता है, परन्तु यह अध्ययन गुगोर दुर्ग के समीपवर्ती “आमेठियां” (क्षारबाग) से प्राप्त सती स्मारकों और पाषाण शिलालेखों (वि. सं. 1555 से 1805) को प्राथमिक स्रोत मानकर तत्कालीन समाज की जटिल आन्तरिक संरचना को उद्घाटित करता है| शोध में रानियों के विविध वंश-नामों (राठौड़, तंवर, सेंगर, चूंडावत आदि) के अभिलेखीय साक्ष्यों के माध्यम से खींची राजवंश के व्यापक वैवाहिक गठबन्धनों और उनके सामाजिक निहितार्थों पर प्रकाश डाला गया है|
इस अध्ययन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू मध्यकालीन “सती प्रथा” का संस्थागत विश्लेषण है| वि. सं. 1754 के महासती शिलालेख के सूक्ष्म लिप्यंतरण से यह प्रमाणित किया गया है कि तत्कालीन समाज में सामूहिक प्राणोत्सर्ग की प्रथा केवल कुलीन पटरानियों तक सीमित नहीं थी, बल्कि “खवास” और “दासियों” (जैसे- रामकली, चमेली आदि) का भी उनके साथ आत्मोत्सर्ग करना एक प्रतिष्ठित और मान्य सामाजिक परम्परा का रूप ले चुका था| इसके अतिरिक्त, प्रस्तुत शोध पत्र पार्वती नदी के तट पर दुर्ग की विशिष्ट भौगोलिक अवस्थिति, मुग़ल-हाड़ा आक्रमणों की पृष्ठभूमि और स्थानीय “रानीदेह” की जनश्रुतियों का ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ मिलान कर युद्धकालीन आपात स्थिति में “जल जौहर” की परिकल्पना को एक ठोस अकादमिक आधार प्रदान करता है|
कूटशब्द : सती प्रथा, जल जौहर, खींची चौहान, महासती शिलालेख, खवास व पड़दायत, पटरानी, पासवान, सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक विरासत|
Cite this Article:
1निवेदिता भार्गव, 2डॉ. विधि शर्मा, “मध्यकालीन हाड़ौती में सामाजिक परम्पराएं : गुगोर के शिलालेखों के विशेष संदर्भ में” Shiksha Samvad International Open Access Peer-Reviewed & Refereed Journal of Multidisciplinary Research, ISSN: 2584-0983 (Online), Volume 03, Issue 04, Pp.509- 514, June-2026. Journal URL: https://shikshasamvad.com/
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